बच्चों और युवाओं को धार्मिक और सुखी बनाने के लिए 25 दिसंबर को “तुलसी पूजन दिवस” मनाईये, जानिए तुलसी पूजन विधि

Tulsi Pujan

पाश्चात्य कल्चर का प्रचार-प्रसार करने वाले पंथ 25 दिसम्बर के निमित्त कई कार्यक्रम करते हैं एवं हमारे बाल, युवा एवं प्रौढ़ – सभी को भोगवाद व हलके संस्कारों की ओर प्रेरित कर महान भारतीय संस्कृति से दूर ले जाते हैं। अतः भारत के सभी सपूतों को चाहिए कि वे अपने-अपने गली-मुहल्लों में ‘तुलसी पूजन दिवस कार्यक्रम’ करें और अपनी संस्कृति के गौरव को समझें समझायें और लाभ उठायें। जो ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के सत्सकंल्प में भागीदार बनते हैं वे संतों का कृपाप्रसाद पाने के अधिकारी बन जाते हैं।

तुलसी पूजन से बुद्धिबल, मनोबल, चारित्र्यबल व आरोग्यबल बढ़ता है। मानसिक अवसाद, आत्महत्या आदि से रक्षा होती है और समाज को भारतीय संस्कृति के इस सूक्ष्म ऋषि-विज्ञान का लाभ मिलता है।

इन दिनों में बीते वर्ष की विदाई पर पाश्चात्य अंधानुकरण से नशाखोरी, आत्महत्या आदि की वृद्धि होती जा रही है। तुलसी उत्तम अवसादरोधक एवं उत्साह, स्फूर्ति, सात्त्विकता वर्धक होने से इन दिनों में यह पर्व मनाना वरदानतुल्य साबित होगा।

जानिए उन संत को, जिन्होंने संस्कृति और धर्म बचाने के लिए, 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत की

80-90 वर्ष पहले तक लगभग प्रत्येक हिन्दू घर में तुलसी का पौधा अवश्य मिलता था, जिसका रोगनाशक तेल हवा के साथ पूरे घर में फैला रहता था। घर के लोग स्नान के बाद तुलसी को जल चढ़ाते थे, उसके पत्तों का सेवन करते थे।

महिलाएँ संध्या-दीप जलाती थीं, तुलसी को भगवद्-स्वरूप मानकर उसकी पूजा-आराधना करती थीं। इससे अनेक रोगों से सुरक्षा रहती थी। संसार में केवल तुलसी ही ऐसा पौधा है जिसके पंचांग में समाया हुआ रोगनाशक तेल हवा के द्वारा आसपास के वायुमंडल में फैल जाता है। आधुनिकता के पीछे आँखें मूँदकर दौड़ने वालों ने तुलसी को घर से बहिष्कृत कर दिया, जिससे बीमारी, कलह, अशांति में कई गुना वृद्धि हुई है।

तुलसी माला धारणः तुलसी की कंठी धारण करने मात्र से कितनी सारी बीमारियों में लाभ होता है, जीवन में ओज, तेज बना रहता है, रोगप्रतिकारक शक्ति सुदृढ़ रहती है। पौराणिक कथाओं में आता है कि तुलसी माला धारण करके किया हुआ सत्कर्म अनंत गुना फल देता है।

अभी विज्ञानी आविष्कार भी इस बात को स्पष्ट करने में सफल हुए हैं कि तुलसी में विद्युत तत्त्व उपजाने और शरीर में विद्युत-तत्त्व को सजग रखने का अदभुत सामर्थ्य है। जैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि तुलसी का इतना सेवन करने से कैंसर नहीं होता लेकिन हम लोगों ने केवल कैंसर मिटाने के लिए ही तुलसी नहीं चुनी है। हम लोगों का नज़रिया केवल रोग मिटाना नहीं है बल्कि मन प्रसन्न करना है, जन्म मरण का रोग मिटाकर जीते जी भगवद् रस जगाना है।”

तुलसी पूजन विधि

२५ दिसम्बर को सुबह स्नानादि के बाद घर के स्वच्छ स्थान पर तुलसी के गमले को जमीन से कुछ ऊँचे स्थान पर रखें | उसमें यह मंत्र बोलते हुए जल चढायें –

महाप्रसादजननी सर्वसौभाग्यवर्धिनी |
आधि व्याधि हरा नित्यम तुलसी त्वां नमोऽस्तु ते ||

फिर ‘तुलस्यै नम:’ मंत्र बोलते हुए तिलक करें, अक्षत (चावल) व पुष्प अर्पित करें तथा वस्त्र व कुछ प्रसाद चढायें। दीपक जलाकर आरती करें और तुलसीजी की ७, ११, २१,५१ व १०८ परिक्रमा करें। उस शुद्ध वातावरण में शांत हो के भगवत्प्रार्थना एवं भगवन्नाम या गुरुमंत्र का जप करें। तुलसी के पास बैठकर प्राणायाम करने से बल, बुद्धि और ओज की वृद्धि होती है।

तुलसी – पत्ते डालकर प्रसाद वितरित करें। तुलसी के समीप रात्रि १२ बजे तक जागरण कर भजन, कीर्तन, सत्संग-श्रवण व जप करके भगवद-विश्रांति पायें। तुलसी – नामाष्टक का पाठ भी पुण्यकारक है। तुलसी – पूजन अपने नजदीकी आश्रम या तुलसी वन में अथवा यथा – अनुकूल किसी भी पवित्र स्थान में कर सकते हैं।

तुलसी – नामाष्टक

वृन्दां वृन्दावनीं विश्वपावनी विश्वपूजिताम् |
पुष्पसारां नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनीम् ||
एतन्नामाष्टकं चैतत्स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् |
य: पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ||

भगवान नारायण देवर्षि नारदजी से कहते हैं : “वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नंदिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी – ये तुलसी देवी के आठ नाम हैं। यह सार्थक नामावली स्तोत्र के रूप में परिणत है।

जो पुरुष तुलसी की पूजा करके इस नामाष्टक का पाठ करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ( ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड :२२.३२-३३)

तुलसी माता के चमत्कार

तुलसी पूजन शुरू करने वाले महान संत कहते हैं : “तुलसी आयु, आरोग्य, पुष्टि देती है। यह उसके दर्शनमात्र से पाप – समुदाय का नाश कर देती है। तुलसी का स्पर्श करनेमात्र से वह शरीर को पवित्र बनाती है और जल देकर प्रणाम करने से रोगों की निवृत्ति होने लगती है और वह व्यक्ति नरक में नहीं जा सकता।

तुलसी के ५ – ७ पत्ते चबाकर खाये व कुल्ला करके वह पानी पी जाय तो वात, पित्त और कफ दोष निवृत्त होते हैं, स्मृतिशक्ति व रोगप्रतिकारक शक्ति भी बढ़ती है तथा जलोदर – भगंदर की बीमारी नहीं होती। तुलसी कैंसर को नष्ट करती है।

जिसके गले में तुलसी – लकड़ी की माला हो अथवा तुलसी का पौधा निकट हो तो उसे यमदूत नहीं छू सकते हैं। तुलसी – माला को गले में धारण करने से शरीर में विद्युत् तत्त्व या अग्नि तत्त्व का संचार अच्छी तरह से होता है, ट्यूमर आदि बन नहीं पाता तथा कफजन्य रोग, दमा, टी.बी. आदि दूर ही रहते हैं। जीवन में ओज – तेज बना यह बात समाने आयी कि तुलसी के पौधे की ९ बार परिक्रमा करने पर उसके आभामंडल के प्रभाव – क्षेत्र में ३ मीटर की आश्चर्यजनक बढ़ोतरी हो गयी। आभामंडल का दायरा जितना अधिक होगा, व्यक्ति उतना ही अधिक कार्यक्षम, मानसिक रूप से क्षमतावान व स्वस्थ होगा।

साभार – ऋषि प्रसाद

क्या आप जानना चाहते की वो अद्भुत, महान और तेजस्वी संत कौन है जिन्होंने तुलसी पूजन की शुरूआत की? आखिर क्या है इसके पीछे की मूल और बड़ी वजह और परिणाम ?

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